प्रश्न – सहृदय की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – रस विवेचन के क्रम में एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभाव और स्थायीभाव आदि का जो विवेचन किया जाता है वह नित्य अपोद्वार बुद्धि से किया जाता है। वस्तुतः रसास्वाद रसिक की अखंड घन प्रतीति है – यह प्रतीति खंडशः नहीं होती। ये विभाव, ये अनुभाव, ये संचारी —- इस प्रकार अनुभूति खंडशः न होकर अखंड अनुभूति होती है। विभावादि का रस निरपेक्ष रूप में सत्ता नहीं होती।
रसिक में तीन विषयों का होना अनिवार्य है – नाट्यगत अर्थों का सामान्यत्व से ग्रहण, प्रतीति-विश्रंरति तथा अनुमानपटुता।
नाट्यगत अर्थों का रसिक यदि सामान्यत्व से ग्रहण न कर सका तो नाट्य में व्यक्ति विशिष्ट के संबंधों की प्रतीति की संभावना उत्पन्न होती है – इससे रस विघ्न होता है।
काव्य में कवि द्वारा जो प्रतीति अभिव्यक्त की जा रही है उसमें रसिक हृदय की विश्रांति होनी चाहिए। इस प्रतीति से कुछ सिद्ध या प्राप्त करना है – ऐसा मान रसिक को नहीं होना चाहिए। यदि यह मान रहा तो रसिक हृदय काव्य प्रतीति में विश्रांत नहीं हो सकता।
सामान्यत्व से ग्रहण करना तथा काव्य प्रतीति में विश्रांति ये दो धर्म जिस बुद्धि में होते हैं उसे आनन्दवर्धन ने तत्वार्थदर्शिनी बुद्धि कहा है।
तन्यमीभवन के लिए तीसरी चीज जो आवश्यक है, वह है अनुमान पटुता। यह अनुमान पटुता न हो तो पाठक को ‘झटिति प्रत्यय’ (अर्थात् अर्थ का कौंध जाना) नहीं होगा। रस के भाव के लिए उसका असंलक्ष्य क्रम होना अनिवार्य है। रसिक को होने वाला यह झटिनि प्रत्यय उतना ही सजीव होता है जितना कि स्वयं रसिक।
इसलिए सहृदय की परिभाषा करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा-
‘‘अधिकारी चात्र विमल प्रतिभाशाली सहृदय’’