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आत्मकथ्य (कविता की व्याख्या)
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास
शब्दार्थ :- मधुप – भौरा। अनंत-नीलिमा – अनंत आकाश। असंख्य – अनेकों।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की।
व्याख्या :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने अपने मन की तुलना भँवरे से की है, जो गुनगुनाकर पता नहीं क्या कहानी कह रहा है। कवि यह नहीं समझ पा रहा है कि वह अपनी जीवन की कौन सी कहानी कहे, क्योंकि उसके समीप मुरझाकर गिरे हुए पत्ते जीवन की नश्वरता का प्रतीक हैं। कवि का मन सोचता है कि ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन भी एक न एक दिन इस पत्ते की तरह मुरझाकर समाप्त हो जाएगा।
कवि के अनुसार, अनंत तक फैले हुए इस नीले आकाश में असंख्य लोगों ने अपने जीवन का इतिहास लिखा है। जिसे पढ़कर कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें लिखने वालों ने अपने आपको ही व्यंग्य तथा उपहास का पात्र बनाया है।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
- “मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी” में अनुप्रास अलंकार है।
- छायावादी शैली है।
तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।
कितु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।
शब्दार्थ :-दुर्बलता – कमजोरी। गागर – घड़ा। रीती – खाली।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की।
व्याख्या :- इन पंक्तियों में प्रसाद जी मित्रों से पूछते हैं कि क्या यह सब देखकर भी वे चाहते हैं कि वह अपनी दुर्बलताओं से युक्त आत्मकथा लिखे। इस खाली गगरी जैसी महत्वहीन आत्मकथा को पढ़कर उन्हें क्या सुख मिलेगा।
कवि आत्मकथा लिखने का आग्रह करने वाले मित्रों से कहते हैं कि मेरी आत्मकथा पढ़कर और मेरे जीवन की खाली गगरी देख कर कहीं ऐसा न हो कि तुम खुद को मेरे दुखों का कारण समझ बैठो और यह सोचो कि तुमने ही मेरी जीवन-रूपी गगरी को खाली किया है।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
- “कहते हो-कह” “सुनकर सुख” में अनुप्रास अलंकार है।
- छायावादी शैली है।
यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।
उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।
शब्दार्थ :- विडंबना – कुछ भी न कर पाना। प्रवंचना – ठगी।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की।
व्याख्या :- प्रस्तुत पंक्तियों से ज्ञात होता है कि कवि का स्वभाव बहुत ही सरल है। इसी सरल स्वभाव के कारण उन्हें जमाने ने धोखा दिया है। कवि कहता है कि वह अपनी भूलों और ठगे जाने के विषय में बताकर अपनी सरलता का उपहास नहीं करना चाहता।
कवि का कहना है कि प्रेमिका के साथ बिताए मधुर क्षण या प्रेमिका के साथ हँसकर की गयी मीठी बातें उनके निजी अनुभव हैं और वे किसी को बताना नही चाहते । ये तो उनके जीवन की पूँजी है।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
- “खिल-खिला” में अनुप्रास अलंकार है।
- छायावादी शैली है।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
शब्दार्थ :- स्वप्न – सपना। आलिंगन – गले लगना। अरुण – लाल रंग। कपोलों – गाल। उषा – भोर। अनुरागिनि – प्यारी।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की।
व्याख्या :- इन पंक्तियों में कवि कहता है- उसने जीवन में सुख के जो सपने देखे वे कभी साकार नहीं हुए। कवि की बाँहों में आते-आते सुख उसे तरसा कर भाग गया। कवि का प्रिय से मिलने का स्वप्न अधूरा ही रह गया।
कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का बखान करते हुए कहता है कि उसकी प्रिया के गालों पर छाई लालिमा सुंदर और मस्ती भरी थी। उसे देखकर लगता था कि प्यारी सुबह भी अपनी माँग में सौभाग्य सिंदूर भरने के लिए कवि की प्रेमिका से लालिमा लिया करती थी।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
- “आलिगन में आते-आते” में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- छायावादी शैली है।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
शब्दार्थ :- स्मृति – याद। पाथेय – संबल। पथिक – राही। पंथा – रास्ता। कंथा – अंतर्मन।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की। इन पंक्तियों में प्रसाद जी कहते हैं कि
व्याख्या :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी प्रेमिका के साथ बिताए हसीन पलों को याद करके कहता है कि आज इस अकेले संसार में उसके जीवन का एकमात्र सहारा उसकी प्रेमिका की यादें हैं। उन्हीं के सहारे कवि जीवन जीने का साहस जुटा पा रहा है। कवि नही चाहता कि कोई इन यादों की सिलाई को उधेड़कर उसके दुखी हृदय में झाँके। कवि लोगों से कहते है कि मेरी आत्मकथा पढ़कर, मेरी यादों को फिर से क्यों ताजा करना चाहते हो ?
कवि का जीवन बहुत ही सरल रहा है। उनके अनुसार जीवन में उन्होंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जिससे वो आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित हो सके। इस छोटे से जीवन को बढ़ा-चढ़ाकर लिखना उसके लिए संभव नहीं है। इस दिखावे को छोडकर वे मौन रहना और दूसरों की यश-गाथाएँ सुनते रहना चाहते हैं।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
- छायावादी शैली है।
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
शब्दार्थ :- भोली – साधारण। मौन – चुपचाप। व्यथा – दुख।
संदर्भ :- प्रस्तुत पंक्तियाँ क्षितिज भाग 2 में संकलित कवि ‘जयशंकर प्रसाद’ की कविता ‘आत्मकथ्य’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग :- ‘आत्मकथ्य’ कविता में प्रसाद जी ने अपनी आत्मकथा के विषय में अपनी मनोभावनाएँ व्यक्त की है। प्रसाद जी के मित्रों और प्रशंसकों ने उनसे आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया था। इस अनुरोध के उत्तर में प्रसाद जी ने इस कविता की रचना की।
व्याख्या :- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपने मित्रों से कहते हैं कि मैंने ऐसा कोई महानता का कार्य नहीं किया जिसका वर्णन मैं कर सकूँ। तुम मेरी साधारण आत्मकथा सुनकर भला क्या करोगे? मेरी आत्मकथा में तुम्हारे लायक कुछ भी नहीं मिलेगा। इसमें कोई उल्लेखनीय विशेषता या प्रेरणापद बात नहीं मिलेगी। इसके अतिरिक्त यह आत्मकथा लिखने का उचित समय भी नहीं है। मुझे जीवन में कष्ट देने वाली व्यथाएँ थककर शांत हो चुकी है। मैं नहीं चाहता कि आत्मकथा लिखकर मैं उन दुखी करने वाली स्मृतियों को फिर से जगा दूँ।
विशेष :-
- कवि की विनम्रता दर्शनीय है।
- साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग है।
- तत्सम् शब्दावली युक्त भाषा है।
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आत्मकथ्य (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न – कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?
उत्तर – कवि निम्नलिखित कारणों से आत्मकथा लिखने से बचना चाहते थे –
(क) कवि स्वयं की जीवन-कथा में ऐसा कुछ विशेष नहीं समझता जिससे दूसरों को कुछ मिल सके।
(ख) कवि अपने जीवन की भूलों और दूसरों द्वारा की गई प्रवंचनाओं को सार्वजनिक नहीं करना चाहता।
(ग) कवि मानता है कि उसकी आत्मकथा दूसरों को सुख प्रदान नहीं कर पाएगी।
(घ) कवि के अनुसार अभी आत्मकथा लिखने का उचित समय नहीं आया है।
प्रश्न – आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ‘अभी समय भी नहीं’ कवि ऐसा क्यों कहता है?
उत्तर – किसी भी बात को कहने का उचित समय होता है। यदि समय से पहले बात कह दी जाए तो उसका महत्त्व कम हो जाता है। अभी कवि की कथा मन के कोने में शांत पड़ी है। कवि मानता है कि उसे अभी ऐसी कोई महान उपलब्धि भी नहीं है जिसके बारे में वह सबको बताए। कवि के अनुसार उसे जीवन में काफी कुछ अनुभव होने शेष थे। इसलिए अभी कवि अपनी आत्मकथा सुनाने का सही समय नहीं मानता।
प्रश्न – स्मृति को ‘पाथेय’ बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर – स्मृति को पाथेय बनाने से कवि का यह आशय है कि जब उसका मिलन प्रिय के साथ हुआ था तो उसके जीवन में थोड़े बहुत मधुर क्षण आए थे। उन क्षणों की स्मृति के सहारे ही वह जी रहा है।
प्रश्न – भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
उत्तर – इन पंक्तियों में कवि कहता है- उसने जीवन में सुख के जो सपने देखे वे कभी साकार नहीं हुए। कवि की बाँहों में आते-आते सुख उसे तरसा कर भाग गया। कवि का प्रिय से मिलने का स्वप्न अधूरा ही रह गया।
(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उत्तर – कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का बखान करते हुए कहता है कि उसकी प्रिया के गालों पर छाई लालिमा सुंदर और मस्ती भरी थी। उसे देखकर लगता था कि प्यारी सुबह भी अपनी माँग में सौभाग्य सिंदूर भरने के लिए कवि की प्रेमिका से लालिमा लिया करती थी।
प्रश्न – ‘उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की’-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर – कवि का कहना है कि प्रेमिका के साथ बिताए मधुर क्षण या प्रेमिका के साथ हँसकर की गयी मीठी बातें उनके निजी अनुभव हैं और वे किसी को बताना नही चाहते । ये तो उनके जीवन की पूँजी है।
प्रश्न – ‘आत्मकथ्य’ कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
उत्तर –
- इस कविता की भाषा खड़ी बोली है।
- इसमें तत्सम शब्दों का भरपूर प्रयोग है। उदाहरणार्थ – मधुप, मलिन, उपहास, दुर्बलता, उज्ज्वल, स्मृति आदि।
- इस कविता पर छायावादी काव्यशैली का स्पष्ट प्रभाव लक्षित होता है ‘उज्जवल गाथा कैसे गाऊँ मधुर चाँदनी रातों की’।
- प्रतीकात्मकता भाषा है – ‘मधुप गुनगुनाकर’।
- लक्षणा शब्द शक्ति है – ‘मुरझाकर गिर रही।
- काव्यभाषा में अलंकारों का समावेश है। जैसे अनुप्रास – पथिक की पंथा।
प्रश्न – कवि ने जो सुख का स्वप्न देखा था उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?
उत्तर – कवि अपनी प्रेमिका के साथ लंबे जीवन अनुभव लेना चाहता था। लेकिन उसने जीवन में सुख के जो सपने देखे वे कभी साकार नहीं हुए। कवि की बाँहों में आते-आते सुख उसे तरसा कर भाग गया। कवि का प्रिय से मिलने का स्वप्न अधूरा ही रह गया।
रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न – इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्तित्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – कविता के माध्यम से कहा जा सकता है कि प्रसाद जी के जीवन में वेदना और पीड़ा थी। वे सुख की कल्पना ही करते रह गए, लेकिन उन्हें सुख नहीं मिला इस कविता में उनकी निराशा झलकती है। प्रसाद जी अपने बारे में कुछ कहने में झिझकते हैं।
प्रश्न – आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर – छात्र स्वयं करें।
प्रश्न – कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना जरूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा “आलो अंधारि” बहुतों के द्वारा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बारे में कुछ लिखिए।
उत्तर – छात्र स्वयं करें।
पाठेतर सक्रियता
प्रश्न – किसी भी चर्चित व्यक्ति का अपनी निजता को सार्वजनिक करना या दूसरों का उनसे ऐसी अपेक्षा करना सही है-इस विषय के पक्ष-विपक्ष में कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर – छात्र स्वयं करें।
प्रश्न – बिना ईमानदारी और साहस के आत्मकथा नहीं लिखी जा सकती। गांधी जी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़कर पता लगाइए कि उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर – छात्र स्वयं करें।
टेस्ट/क्विज
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