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कार्यालयी लेखन और प्रक्रिया
सरकारी कार्यालयों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कार्यालयी पत्रों को कई श्रेणियों में बाँट दिया गया है। मसलन, कई पत्र सूचनाएँ माँगने या भेजने के लिए लिखे जाते हैं। कुछ पत्रों द्वारा मुख्यालय या बड़े अधिकारी अपने अधीनस्थ कार्यालयों या अधीनस्थ कर्मचारियों को आदेश भेजते हैं। कुछ पत्र अखबारों को विभागीय गतिविधियों की जानकारी देने के लिए भेजे जाते हैं। हर श्रेणी के पत्र के लिए एक विशेष स्वरूप निर्धारित कर दिया गया है।
प्रश्न – सरकारी पत्र लिखते हुए किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर – सरकारी पत्र औपचारिक पत्र की श्रेणी में आते हैं। सरकारी पत्र लिखते हुए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
- प्रायः ये पत्र एक कार्यालय, विभाग अथवा मंत्रलय से दूसरे कार्यालय, विभाग या मंत्रलय को लिखे जाते हैं।
- पत्र के शीर्ष पर कार्यालय, विभाग या मंत्रलय का नाम व पता लिखा जाता है।
- पत्र के बाईं तरफ़ फ़ाइल संख्या लिखी जाती है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि पत्र किस विभाग द्वारा किस विषय के तहत कब लिखा जा रहा है
- जिसे पत्र लिखा जा रहा है उसका नाम, पता आदि बाईं तरफ़ लिखा जाता है। कई बार अधिकारी का नाम भी दिया जाता है।
- ‘सेवा में’ का प्रयोग धीरे-धीरे कम हो रहा है।
- ‘विषय’ शीर्षक के अंतर्गत संक्षेप में यह लिखा जाता है कि पत्र किस प्रयोजन के लिए या किस संदर्भ में लिखा जा रहा है।
- विषय के बाद बाईं तरफ़ ‘महोदय’ संबोधन लिखा जाता है।
- पत्र की भाषा सरल एवं सहज होनी चाहिए। क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
- अनेक बार सटीक अर्थ प्रेषित करने के लिए प्रशासनिक शब्दावली का प्रयोग करना ही उचित होता है।
- इस पत्र के बाईं ओर प्रेषक का पता और तारीख दी जाती है।
- पत्र के अंत में ‘भवदीय’ शब्द का प्रयोग अधोलेख के रूप में होता है।
- भवदीय के नीचे पत्र भेजने वाले के हस्ताक्षर होते हैं। हस्ताक्षर के नीचे कोष्ठक में पत्र लिखने वाले का नाम मुद्रित होता है। नाम के नीचे पदनाम लिखा जाता है।
प्रश्न – मुख्य टिप्पण या नोटिंग किसे कहते हैं?
उत्तर – किसी भी विचाराधीन पत्र अथवा प्रकरण को निपटाने के लिए उस पर जो राय, मंतव्य, आदेश अथवा निर्देश दिया जाता है वह टिप्पणी कहलाती है। टिप्पणी शब्द अंग्रेजी के नोटिग शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है। टिप्पणी लिखने की प्रक्रिया को टिप्पण यानी नोटिंग कहते हैं।
प्रश्न – टिप्पण या नोटिंग के क्या उद्देश्य होते हैं?
उत्तर –
- टिप्पणी का उद्देश्य उन तथ्यों को स्पष्ट तथा तर्कसंगत रूप से प्रस्तुत करना है जिन पर निर्णय लिया जाना है।
- साथ ही उन बातों की ओर भी संकेत करना है जिनके आधार पर उक्त निर्णय संभवतः लिया जा सकता है।
- टिप्पण का उद्देश्य मामलों को नियमानुसार निपटाना है।
प्रश्न – टिप्पण मुख्यतः कितने स्तर होता है?
उत्तर – टिप्पण मुख्यतः दो स्तर पर होता है-
- सहायक स्तर पर टिप्पण
- अधिकारी स्तर पर टिप्पण।
प्रश्न – आरंभिक टिप्पण या मुख्य टिप्पण किसे कहते हैं?
उत्तर – कार्यालय में टिप्पण कार्य अधिकतर सहायक स्तर पर होता है। इसे आरंभिक टिप्पण या मुख्य टिप्पण कहते हैं जिसमें सहायक विचाराधीन मामले का संक्षिप्त ब्योरा देते हुए उसका विवेचन करता है।
प्रश्न – मुख्य टिप्पण या नोटिंग लिखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर –
- इस प्रकार के टिप्पण में सबसे पहले मूल पत्र या आवती में दिए गए विवरण या तथ्य का सार दिया जाता है। फिर निहित प्रस्ताव की व्याख्या की जाती है और संबंधित नियमों-विनियमों का हवाला देते हुए अपनी राय दी जाती है।
- टिप्पणी लिखने के बाद सहायक अधिकारी दाहिनी ओर अपने हस्ताक्षर कर उसे अपने अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत करता है। जिस अधिकारी को प्रस्तुत किया जाना है उसका पदनाम वहाँ बाईं ओर लिखा जाता है।
- टिप्पणी लिखने से पूर्व सहायक के लिए संबंधित विषय को समझना बहुत आवश्यक होता है।
- टिप्पणी अपने आप में पूर्ण एवं स्पष्ट होनी चाहिए। इसमें असली मुद्दे पर अधिक बल देना चाहिए।
- टिप्पणी संक्षिप्त, विषय-संगत, तर्कसंगत और क्रमबद्ध होनी चाहिए।
- टिप्पणकार को अपने विचार संतुलित एवं शिष्ट भाषा में देने चाहिए। इसमें व्यक्तिगत आक्षेप, उपदेश या पूर्वाग्रहों के लिए कोई स्थान नहीं होता।
- टिप्पणी सदैव अन्य पुरुष में लिखी जाती है।
प्रश्न – आनुषंगिक टिप्पणी किसे कहते हैं?
उत्तर – सहायक, आरंभिक या मुख्य टिप्पणी को जब संबंधित अधिकारी के पास भेजता है तो वह अधिकारी टिप्पणी पढ़ने के बाद नीचे मंतव्य लिखता है। इसे आनुषंगिक टिप्पणी कहते हैं और यह क्रिया आनुषंगिक टिप्पण कहलाती है।
प्रश्न – आनुषंगिक टिप्पणी लिखते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर –
- अगर अधिकारी अपने अधीनस्थ की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत है तो इस प्रकार की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं होती। अधिकारी अधीनस्थ की टिप्पणी के नीचे या तो केवल हस्ताक्षर भर करता है या ‘मैं उपर्युक्त टिप्पणी से सहमत हूँ’, लिखता है।
- अगर अधिकारी अपने अधीनस्थ की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत है मगर उसे और सशक्त एवं तर्कसंगत बनाने के लिए अपनी ओर से भी कुछ जोड़ना चाहता है तो वह अपना मंतव्य आनुषंगिक टिप्पणी के रूप में दर्ज कर देता है।
- यदि अधिकारी पूर्णतः असहमत है या आंशिक रूप से सहमत है तो वह अपने तर्क और कारणों के साथ अपनी आनुषंगिक टिप्पणी करता है।
- अधिकारी को अधीनस्थ की टिप्पणी को काटने, बदलने या हटाने का अधिकार नहीं है। वह केवल अपनी सहमति, आंशिक सहमति या असहमति व्यक्त कर सकता है।
- आनुषंगिक टिप्पणी प्रायः संक्षिप्त होती है लेकिन असहमति की स्थिति में कई बार इस प्रकार की टिप्पणी बड़ी भी हो सकती है।
प्रश्न – स्मरण पत्र या अनुस्मारक (रिमाइंडर) किसे कहा जाता है?
उत्तर – जब किसी पत्र, ज्ञापन इत्यादि का उत्तर समय पर प्राप्त नहीं होता तो याद दिलाने के लिए ‘अनुस्मारक’ भेजा जाता है। इसे ‘स्मरण पत्र’ भी कहते हैं।
प्रश्न – स्मरण पत्र या अनुस्मारक (रिमाइंडर) लिखते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर –
- इसका प्रारूप औपचारिक पत्र की तरह ही होता है मगर आकार छोटा होता है।
- अनुस्मारक के शुरू में पूर्व पत्र का हवाला दिया जाता है।
- जब एक से अधिक अनुस्मारक भेजे जाते हैं, तो पहले अनुस्मारक को ‘अनुस्मारक-1’, दूसरे को ‘अनुस्मारक-2’, तीसरे को ‘अनुस्मारक-3’ इत्यादि लिखते हैं।
प्रश्न – अर्द्ध सरकारी पत्र किसे कहते हैं।
उत्तर – औपचारिक-पत्र के विपरीत अर्ध-सरकारी पत्र में अनौपचारिकता का पुट होता है। इसमें एक मैत्री भाव होता है। अर्ध-सरकारी पत्र तब लिखे जाते हैं जब लिखने वाला अधिकारी संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत स्तर पर जानता है।प्रकार का पत्र ऐसी स्थिति में भी लिखा जाता है जब किसी खास मसले पर संबोधित अधिकारी का ध्यान व्यक्तिगत रूप से आकर्षित कराया जाता है या उसका व्यक्तिगत परामर्श लिया जाए। प्रारूप में बाईं ओर शीर्ष पर प्रेषक का नाम होता है। इसके नीचे उसका पदनाम होता है। अर्ध-सरकारी पत्र के लिए अमूमन कार्यालय के ‘लेटर हेड’ का प्रयोग होता है, अगर उपलब्ध हो। पत्र के प्रारंभ में संबोधन के रूप में महोदय या प्रिय महोदय का प्रयोग नहीं होता। ऐसे पत्र में आमतौर पर प्रयोग किया जाने वाला संबोधन ‘प्रिय श्री—’ या ‘प्रियवर श्री—, हो सकता है। पत्र के अंत में अधोलेख के रूप में दाहिनी ओर ‘भवदीय’ के स्थान पर ‘आपका’ का प्रयोग किया जाता है। अंत में बाईं ओर संबोधित अधिकारी का नाम, पदनाम और पूरा पता दिया जाता है।
प्रश्न- कार्यसूची किसे कहते हैं?
उत्तर – विभिन्न संस्थाओं और कार्यालयों में विभिन्न विषयों में विचार-विमर्श कर निर्णय तक पहुँचने के लिए कई समितियों का गठन किया जाता है। इन समितियों में अध्यक्ष, सचिव के अतिरिक्त अन्य सदस्य भी होते हैं। जब किसी विषय पर विचार-विमर्श करना हो अथवा निर्णय लेना हो तो समिति के सब सदस्य एक निश्चित समय में पूर्व निश्चित स्थान पर बैठक का आयोजन करते हैं। बैठक प्रारंभ होने से पहले विचारणीय मुद्दों की एक क्रमवार सूची बनाई जाती है, जिसे कार्यसूची (एजेंडा) कहते हैं।
प्रश्न- कार्यसूची का निर्माण क्यों किया जाता है?
उत्तर :- कार्यसूची का निर्माण इसलिए किया जाता है ताकि केवल उन विषयों पर चर्चा की जाए जो विचारणीय हैं। इससे समय की तो बचत होती ही है साथ में विषय से भटकने की स्थिति भी नहीं आती। किसी भी संस्था की औपचारिक बैठक की कार्यसूची उस बैठक में चर्चा के लिए निर्धारित विषयों की अग्रिम जानकारी देती है। इससे बैठक के अनुशासित संचालन में सहायता मिलती है। निर्धारित विषयों से संबंधित स्वतः स्पष्ट टिप्पणियाँ अपने संलग्नकों के साथ सदस्यों को कार्यसूची के साथ अग्रिम रूप से भेजी जानी चाहिए ताकि वे बैठक में पूरी तैयारी से आ सकें।
प्रश्न – कार्यवृत्त (मिनिट्स) किसे कहते हैं?
उत्तर – कार्यसूची में दिए गए मुद्दों को सचिव बैठक में प्रस्तुत करता है। समिति के अधयक्ष की उपस्थिति में सभी सदस्य विचारणीय मुद्दों पर अपने-अपने विचार व्यक्त करते हैं। विचार -विमर्श के बाद निर्णय लेते हैं। प्रत्येक मुद्दे पर किया गया विचार विमर्श एवं निर्णय ही कार्यवृत्त है।
कार्यसूची में रेखांकित कार्यों पर हुए विचार-विमर्श का संक्षिप्त विवरण कार्यवृत्त में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें क्रमशः उपस्थित लोगों की राय का पूरा विवरण दिया जाना चाहिए। उपस्थित व्यक्तियों के नाम पदानुसार दिए जाने चाहिए।
प्रश्न – प्रेस विज्ञप्ति किसे कहते हैं?
उत्तर – कोई संस्थान या व्यक्ति किसी विषय या किसी बैठक में जो निर्णय लेता है, उसे प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से सर्वसामान्य तक पहुँचाया जाता है। निर्णय में विलंब का कारण और उससे होने वाले लाभ के बारे में भी जानकारी दी जाती है।
प्रश्न – परिपत्र किसे कहते हैं?
उत्तर – बैठक में लिए गए महत्त्वपूर्ण निर्णयों को कार्यान्वित करने के लिए परिपत्र जारी किया जाता है। जिस मुद्दे को लेकर पहला परिपत्र जारी किया जाता है उस मुद्दे पर होने वाला फ़ैसला भी परिपत्र के रूप में जारी किया जाता है जिसमें निर्णय को कार्यान्वित किए जाने के निर्देश होते हैं।
प्रश्न – प्रतिवेदन किसे कहते हैं?
उत्तर – ‘प्रतिवेदन’ शब्द ‘प्रति’ ‘उपसर्ग’ और ‘विद्’ धातु के योग से बना है। इसका
अर्थ है सम्यक् अर्थात् पूरी जानकारी। इस प्रकार ‘प्रतिवेदन’ से अभिप्राय अनुभव से युक्त विभिन्न तथ्यों का विस्तृत लेखा-जोखा है।
प्रश्न – प्रतिवेदन और रिपोर्ट में क्या अंतर है?
उत्तर – प्रायः रिपोर्ट एवं प्रतिवेदन को समान अर्थ में ले लिया जाता है किंतु ‘प्रतिवेदन’ शब्द का अर्थ, स्वरूप और विषय वस्तु रिपोर्ट से काफ़ी भिन्न है जैसे-पुलिस को घटना की रिपोर्ट दी जाती है, डाक्टर मरीज की रिपोर्ट पढ़ता है, संवाददाता समाचार के लिए रिपोर्ट लिखता है। यहाँ पर रिपोर्ट का अर्थ सामान्य विवरण से हैं जबकि ‘प्रतिवेदन’ किसी घटना, कार्ययोजना इत्यादि का अनुभव और तथ्यों से परिपूर्ण विवरण है जो लिखित रूप से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कार्य विशेष की जानकारी तो दी जाती है, साथ ही विभिन्न आंकड़ाें आदि के माधयम से निष्कर्ष, सुझाव और संस्तुतियाँ भी दी जाती हैं।
प्रश्न – प्रतिवेदन कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर – प्रतिवेदन दो प्रकार के होते हैं- औपचारिक प्रतिवेदन और अनौपचारिक प्रतिवेदन ।
प्रश्न – औपचारिक प्रतिवेदन किसे कहते हैं?
उत्तर – जब सरकार या किसी संस्था अथवा विशिष्ट अधिकारी के आदेशानुसार किसी कार्य विशेष के बारें में प्रतिवेदन तैयार किया जाता है उसे औपचारिक प्रतिवेदन कहा जाता है। उसे औपचारिक प्रतिवेदन कहते हैं इसका वस्तुनिष्ठ और तथ्यात्मक होना अनिवार्य है।
प्रश्न – अनौपचारिक प्रतिवेदन किसे कहते हैं?
उत्तर – अनौपचारिक प्रतिवेदन किसी व्यक्ति विशेष का अपना अध्ययन एवं निष्कर्ष है। समाचार पत्रों में इस प्रकार के प्रतिवेदन प्रकाशित होते रहते हैं। इसमें अकेला व्यक्ति ही उत्तरदायी होता है।
प्रश्न – प्रतिवेदन-लेखन के लिए किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है?
उत्तर – प्रतिवेदन-लेखन के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है-
- रूपरेखा पहले बनानी चाहिए।
- तथ्यों का संकलन
- विवेकपूर्ण, निष्पक्ष अधययन
- विचारों की प्रामाणिकता
- विषय केन्द्रित अधययन
- सही निर्णय
- अनावश्यक विस्तार से बचें।
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