दंडक वन में दस वर्ष
शब्दार्थ :- कोलाहल – शोर। शिलाखंड – चट्टान का हिस्सा। हस्तक्षेप – दखल। बाधा – रुकावट। परिपूर्ण – भरा हुआ। संहार – मारना। अकारण – बिना किसी कारण के। अहित – नुकसान। निरंतर – लगातार। अस्तित्व – वजूद, हस्ती। निहारते – देखते। विकृत चेहरा – बदसूरत। संकेत – इशारा। अमंगल – अशुभ। पिछलग्गू – पीछे चलने वाले। विलक्षण – अद्भुत। प्रशंसा – तारीफ। मुग्ध – मोहित। संदेह – शक। आग्रह – हठ। प्रवास – एक स्थान छोडकर दूसरे स्थान पर रहना।
पाठ का सार
राम चित्रकूट से दो कारणों से दूर जाना चाहते थे –
- चित्रकूट अयोध्या से केवल चार दिन की दूरी पर था। लोगों का आना-जाना लगा रहता। वे प्रश्न पूछते। राय माँगते। यह राजकाज में हस्तक्षेप की तरह होता।
- राम-लक्ष्मण ने उस वन से राक्षसों का सफ़ाया कर दिया था। अब तपस्या में कोई बाधा नहीं थी। लेकिन मुनिगण वन छोड़ना चाहते थे। कुछ राक्षस मायावी थे। जब-तब आ धमकते थे। यज्ञ में बाधा डालते थे।
राम, सीता और लक्ष्मण ने चित्रकूट छोड़ते हुए मुनि अत्रि से विदा ली। चित्रकूट के छोड़कर राम दंडक वन में चले गए। दंडकारण्य घना था। पशु-पक्षियों और वनस्पतियों से परिपूर्ण। इस वन में अनेक तपस्वियों के आश्रम थे।
दंडक वन के ऋषि राम को देखकर प्रसन्न हुए क्योंकि दंडक वन में राक्षस भी कम नहीं थे। वे ऋषि-मुनियों को कष्ट देते थे। अनुष्ठानों में विघ्न डालकर। राम को देखकर मुनिगण बहुत प्रसन्न हुए। मुनियों ने राम का स्वागत करते हुए कहा, “आप उन दुष्ट मायावी राक्षसों से हमारी रक्षा करें। आश्रमों को अपवित्र होने से बचाएँ।” सीता दैत्यों के संदर्भ में सोच रही थी। वे चाहती थीं कि राम अकारण राक्षसों का वध न करें। उन्हें न मारें, जिन्होंने उनका कोई अहित नहीं किया है।
राम, लक्ष्मण और सीता दंडक वन में दस वर्ष वर्ष रहे। राम जब क्षरभंग मुनि के आश्रम पहुँचे। आश्रम में बहुत कम तपस्वी बचे थे। सभी निराश थे। उन्होंने राम को हड्डियों का ढेर दिखाकर कहा, “राजकुमार! ये ऋषियों के कंकाल हैं, जिन्हें राक्षसों ने मार डाला है। अब यहाँ रहना असंभव है।”
क्षरभंग मुनि के आश्रम में सुतीक्ष्ण मुनि ने राम को राक्षसों के अत्याचार की कहानी सुनाई। सुतीक्ष्ण मुनि ने राम को अगस्त्य ऋषि से मिलने की सलाह दी। विध्याचल पार करने वाले पहले ऋषि अगस्त्य ऋषि थे। अगस्त्य ऋषि ने राम को गोदावरी नदी के किनारे जाने को कहा।
गोदावरी नदी के तट पर जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता ने वनवास का शेष समय बिताया, उस स्थान का पंचवटी नाम था। पंचवटी के मार्ग में राम को एक विशालकाय गिद्ध मिला, उसका नाम जटायु था। सीता जटायु का स्वरूप देखकर डर गई। लक्ष्मण ने जटायु को मायावी राक्षस समझा।
लक्ष्मण ने जटायु को मायावी राक्षस समझकर उसे मारने के लिए अपना धनुष उठा लिया। जटायु ने कहा, ‘हे राजन! मुझसे डरो मत। मैं तुम्हारे पिता का मित्र हूँ। वन में तुम्हारी सहायता करूँगा। आप दोनों बाहर जाएँगे तो सीता की रक्षा करूँगा।”
पंचवटी में लक्ष्मण ने बहुत सुंदर कुटिया बनाई। मिट्टी की दीवारें खड़ी कीं। बाँस के खंभे लगाए। कुश और पत्तों से छप्पर डाला। कुटिया ने उस मनोरम पंचवटी को और सुंदर बना दिया। कुटी के आसपास पुष्पलताएँ थीं। हिरण घूमते थे। मोर नाचते थे।
पंचवटी के पास राम ने सीता को पकड़ ले जाने वाले विराध राक्षस को मारा था। लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा का नाम शूर्पणखा था। शूर्पणखा ने राम से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की। शूर्पणखा के विवाह के प्रस्ताव पर राम ने उसे सीता की ओर संकेत करते हुए कहा, “ये मेरी पत्नी हैं। मेरा विवाह हो चुका है।”
राम द्वारा पूछने पर शूर्पणखा ने अपना परिचय बताया – वह रावण और कुंभकर्ण की बहन है और अविवाहित है। राम द्वारा विवाह के लिए मना करने पर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास पास गई।
लक्ष्मण ने क्या कहकर शूर्पणखा से विवाह करने से मना कर दिया। लक्ष्मण ने कहा, “मेरे पास आने से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, देवी! मैं तो राम का दास हूँ। मुझसे विवाह करके तुम दासी बन जाओगी।”
राम और लक्ष्मण के द्वारा विवाह के लिए मना करने पर शूर्पणखा ने क्रोध में आकर सीता पर झपट्टा मारा। सोचा कि राम इसी के कारण विवाह नहीं कर रहे हैं।शूर्पणखा द्वारा सीता पर झपट्टा मारे जाने के बाद लक्ष्मण तत्काल उठ खड़े हुए। तलवार खींची और उसके नाक-कान काट लिए।
शूर्पणखा के नाक-कान काट लिए जाने पर खून से लथपथ शूर्पणखा वहाँ से रोती-बिलखती भागी। अपने भाई खर और दूषण के पास। खर और दूषण शूर्पणखा के छोटे भाई थे। शूर्पणखा की दशा देखकर खर-दूषण के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने तत्काल चौदह राक्षस भेजे। राक्षस राम के सामने नहीं टिक सके। देखते ही देखते उन्होंने सबको ढेर कर दिया। शूर्पणखा ने एक पेड़ के पीछे से यह दृश्य देखा। राम के पराक्रम से वह चकित थी। उसका मोह और बढ़ गया। साथ ही क्रोध भी बढ़ा। वह फुफकारती हुई खर-दूषण के पास लौटी।
खर-दूषण राक्षसों की पूरी सेना के साथ चले। खर ने देखा कि आसमान काला पड़ गया। घोड़े स्वयं धरती पर गिरकर मर गए। आकाश में गिद्ध मँडराने लगे। ये अमंगल के संकेत थे। पर वह रुका नहीं। आगे बढ़ता गया। घमासान युद्ध हुआ। अंत में विजय राम की हुई। खर-दूषण सहित उनकी सेना धराशायी हो गई। कुछ पिछलग्गू राक्षस बचे। वे जान बचाकर वहाँ से भाग निकले।
खर-दूषण के मरने के बाद अकंपन राक्षस बचकर रावण के पास पहुँचा। अकंपन ने कहा, “राम कुशल योद्धा हैं। उनके पास विलक्षण शक्तियाँ हैं। उन्हें कोई नहीं मार सकता। इसका एक ही उपाय है। सीता का अपहरण। इससे उनके प्राण स्वयं ही निकल जाएँगे।”
अकंपन की बात सुनकर रावण सीता हरण के लिए तैयार हो गया। रावण को सीता हरण से बचने के लिए तड़का के पुत्र मारीच ने समझाया। रावण ने मारीच की बात मान ली। चुपचाप लंका लौट गया।
शूर्पणखा रावण को धिक्कार रही थी। फटकार रही थी। उसके पौरुष को ललकारते हुए शूर्पणखा ने कहा, “तेरे महाबली होने का क्या लाभ? तेरे रहते मेरी यह दुर्गति? तेरा बल किस दिन के लिए है? तू किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रह गया है।” शूर्पणखा ने राम-लक्ष्मण के बल की प्रशंसा की। सीता को अतीव सुंदरी बताया। कहा कि उसे लंका के राजमहल में होना चाहिए। शूर्पणखा बोली, “मैं सीता को तुम्हारे लिए लाना चाहती थी। मैंने उन्हें बताया कि मैं रावण की बहन हूँ। क्रोध में लक्ष्मण ने मेरे नाक-कान काट लिए।”
शूर्पणखा की बात सुनकर रावण मारीच को मदद करने की आज्ञा दी। रथ पर बैठकर रावण और मारीच पंचवटी पहुँचे। मारीच ने सोने के हिरण का रूप धारण कर लिया। रावण ने तपस्वी का वेश धारण कर लिया था। रावण एक पेड़ के पीछे छिपा था। सीता उस हिरण पर मुग्ध हो गईं। उन्होंने राम से उसे पकड़ने को कहा। राम को हिरण पर संदेह था। सीता की प्रसन्नता के लिए राम हिरण के पीछे चले गए। उन्होंने सोचा, “वन में इतने समय के प्रवास के दौरान सीता ने कभी कुछ नहीं माँगा। उनकी यह इच्छा अवश्य पूरी करनी चाहिए।”
कुटी से निकलते समय राम ने लक्ष्मण को बुलाया। सीता की रक्षा करने का आदेश दिया। कहा, “मेरे लौटने तक तुम उन्हें अकेला मत छोड़ना।” लक्ष्मण ने सिर झुकाकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। सीता कुटी में थीं। लक्ष्मण धनुष लेकर बाहर खड़े हो गए।
पाठ पर आधारित अभ्यास-प्रश्न
प्रश्न :- राम चित्रकूट से दूर क्यों जाना चाहते थे?
उत्तर :- राम चित्रकूट से दो कारणों से दूर जाना चाहते थे –
- चित्रकूट अयोध्या से केवल चार दिन की दूरी पर था। लोगों का आना-जाना लगा रहता। वे प्रश्न पूछते। राय माँगते। यह राजकाज में हस्तक्षेप की तरह होता।
- राम-लक्ष्मण ने उस वन से राक्षसों का सफ़ाया कर दिया था। अब तपस्या में कोई बाधा नहीं थी। लेकिन मुनिगण वन छोड़ना चाहते थे। कुछ राक्षस मायावी थे। जब-तब आ धमकते थे। यज्ञ में बाधा डालते थे।
प्रश्न :- राम, सीता और लक्ष्मण ने चित्रकूट छोड़ते हुए किस मुनि से विदा ली।
उत्तर :- मुनि अत्रि से।
प्रश्न :- चित्रकूट को छोड़कर राम कहाँ चले गए?
उत्तर :- दंडक वन में।
प्रश्न :- दंडक वन का वातावरण कैसा था?
उत्तर :- दंडकारण्य घना था। पशु-पक्षियों और वनस्पतियों से परिपूर्ण। इस वन में अनेक तपस्वियों के आश्रम थे।
प्रश्न :- दंडक वन के ऋषि राम को देखकर क्यों प्रसन्न हुए?
उत्तर :- दंडक वन में राक्षस भी कम नहीं थे। वे ऋषि-मुनियों को कष्ट देते थे। अनुष्ठानों में विघ्न डालकर। राम को देखकर मुनिगण बहुत प्रसन्न हुए। मुनियों ने राम का स्वागत करते हुए कहा, “आप उन दुष्ट मायावी राक्षसों से हमारी रक्षा करें। आश्रमों को अपवित्र होने से बचाएँ।”
प्रश्न :- सीता दैत्यों के संदर्भ में क्या सोच रही थी?
उत्तर :- वे चाहती थीं कि राम अकारण राक्षसों का वध न करें। उन्हें न मारें, जिन्होंने उनका कोई अहित नहीं किया है।
प्रश्न :- राम, लक्ष्मण और सीता दंडक वन में कितने वर्ष रहे?
उत्तर :- दस वर्ष।
प्रश्न :- क्षरभंग मुनि के आश्रम की कैसी स्थिति थी?
उत्तर :- राम जब क्षरभंग मुनि के आश्रम पहुँचे। आश्रम में बहुत कम तपस्वी बचे थे। सभी निराश थे। उन्होंने राम को हड्डियों का ढेर दिखाकर कहा, “राजकुमार! ये ऋषियों के कंकाल हैं, जिन्हें राक्षसों ने मार डाला है। अब यहाँ रहना असंभव है।”
प्रश्न :- क्षरभंग मुनि के आश्रम में किस मुनि ने राम को राक्षसों के अत्याचार की कहानी सुनाई?
उत्तर :- सुतीक्ष्ण मुनि ने।
प्रश्न :- सुतीक्ष्ण मुनि ने राम को किस मुनि से मिलने की सलाह दी?
उत्तर :- सुतीक्ष्ण मुनि ने ही राम को अगस्त्य ऋषि से भेंट करने की सलाह दी।
प्रश्न :- विध्याचल पार करने वाले पहले ऋषि कौन थे?
उत्तर :- अगस्त्य ऋषि।
प्रश्न :- अगस्त्य ऋषि ने राम को किस नदी के किनारे जाने को कहा?
उत्तर :- गोदावरी नदी।
प्रश्न :- गोदावरी नदी के तट पर जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता ने वनवास का शेष समय बिताया, उस स्थान का क्या नाम था?
उत्तर :- पंचवटी।
प्रश्न :- पंचवटी के मार्ग में राम को एक विशालकाय गिद्ध मिला, उसका नाम क्या था?
उत्तर :- जटायु।
प्रश्न :- कौन जटायु का स्वरूप देखकर डर गया?
उत्तर :- सीता।
प्रश्न :- लक्ष्मण ने जटायु को क्या समझा?
उत्तर :- मायावी राक्षस।
प्रश्न :- लक्ष्मण ने जटायु को मायावी राक्षस समझकर क्या करना चाहा?
उत्तर :- उसे मारने के लिए अपना धनुष उठा लिया।
प्रश्न :- जटायु ने अपने बारे में क्या बताया?
उत्तर :- जटायु ने कहा, “हे राजन! मुझसे डरो मत। मैं तुम्हारे पिता का मित्र हूँ। वन में तुम्हारी सहायता करूँगा। आप दोनों बाहर जाएँगे तो सीता की रक्षा करूँगा।”
प्रश्न :- पंचवटी में लक्ष्मण द्वारा बनाई गई कुटिया की शोभा कैसी थी?
उत्तर :- पंचवटी में लक्ष्मण ने बहुत सुंदर कुटिया बनाई। मिट्टी की दीवारें खड़ी कीं। बाँस के खंभे लगाए। कुश और पत्तों से छप्पर डाला। कुटिया ने उस मनोरम पंचवटी को और सुंदर बना दिया। कुटी के आसपास पुष्पलताएँ थीं। हिरण घूमते थे। मोर नाचते थे।
प्रश्न :- पंचवटी के पास राम ने सीता को पकड़ ले जाने वाले किस राक्षस को मारा था?
उत्तर :- विराध को।
प्रश्न :- लंका के राजा रावण की बहन शूर्पणखा का नाम क्या था?
उत्तर :- शूर्पणखा।
प्रश्न :- शूर्पणखा ने राम से क्या इच्छा व्यक्त की?
उत्तर :- शूर्पणखा ने राम से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की।
प्रश्न :- शूर्पणखा के विवाह के प्रस्ताव पर राम ने उसे क्या कहा?
उत्तर :- सीता की ओर संकेत करते हुए कहा, “ये मेरी पत्नी हैं। मेरा विवाह हो चुका है।”
प्रश्न :- राम द्वारा पूछने पर शूर्पणखा ने अपना परिचय क्या बताया?
उत्तर :- वह रावण और कुंभकर्ण की बहन है और अविवाहित है।
प्रश्न :- राम द्वारा विवाह के लिए मना करने पर शूर्पणखा किसके पास गई?
उत्तर :- लक्ष्मण के पास।
प्रश्न :- लक्ष्मण ने क्या कहकर शूर्पणखा से विवाह करने से मना कर दिया?
उत्तर :- लक्ष्मण ने कहा, “मेरे पास आने से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, देवी! मैं तो राम का दास हूँ। मुझसे विवाह करके तुम दासी बन जाओगी।”
प्रश्न :- राम और लक्ष्मण के द्वारा विवाह के लिए मना करने पर शूर्पणखा ने क्या किया?
उत्तर :- क्रोध में आकर उसने सीता पर झपट्टा मारा। सोचा कि राम इसी के कारण विवाह नहीं कर रहे हैं।
प्रश्न :- शूर्पणखा द्वारा सीता पर झपट्टा मारे जाने के बाद लक्ष्मण ने क्या किया?
उत्तर :- लक्ष्मण तत्काल उठ खड़े हुए। तलवार खींची और उसके नाक-कान काट लिए।
प्रश्न :- शूर्पणखा के नाक-कान काट लिए जाने पर उसने क्या किया?
उत्तर :- खून से लथपथ शूर्पणखा वहाँ से रोती-बिलखती भागी। अपने भाई खर और दूषण के पास।
प्रश्न :- खर और दूषण कौन थे?
उत्तर :- खर और दूषण शूर्पणखा के छोटे भाई थे।
प्रश्न :- शूर्पणखा की दशा देखकर खर-दूषण ने क्या किया?
उत्तर :- शूर्पणखा की दशा देखकर खर-दूषण के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने तत्काल चौदह राक्षस भेजे।
प्रश्न :- खर-दूषण के द्वारा भेजे गए राक्षस किसके हाथों मारे गए?
उत्तर :- राक्षस राम के सामने नहीं टिक सके। देखते ही देखते उन्होंने सबको ढेर कर दिया।
प्रश्न :- राम के द्वारा खर-दूषण के राक्षस मारे जाने पर शूर्पणखा ने क्या किया?
उत्तर :- शूर्पणखा ने एक पेड़ के पीछे से यह दृश्य देखा। राम के पराक्रम से वह चकित थी। उसका मोह और बढ़ गया। साथ ही क्रोध भी बढ़ा। वह फुफकारती हुई खर-दूषण के पास लौटी।
प्रश्न :- खर-दूषण के साथ युद्ध में राम किस प्रकार विजयी हुए?
उत्तर :- खर-दूषण राक्षसों की पूरी सेना के साथ चले। खर ने देखा कि आसमान काला पड़ गया। घोड़े स्वयं धरती पर गिरकर मर गए। आकाश में गिद्ध मँडराने लगे। ये अमंगल के संकेत थे। पर वह रुका नहीं। आगे बढ़ता गया। घमासान युद्ध हुआ। अंत में विजय राम की हुई। खर-दूषण सहित उनकी सेना धराशायी हो गई। कुछ पिछलग्गू राक्षस बचे। वे जान बचाकर वहाँ से भाग निकले।
प्रश्न :- खर-दूषण के मरने के बाद कौन-सा राक्षस बचकर रावण के पास पहुँचा?
उत्तर :- अकंपन।
प्रश्न :- अकंपन ने रावण को राम के विषय में क्या बताया?
उत्तर :- अकंपन ने कहा, “राम कुशल योद्धा हैं। उनके पास विलक्षण शक्तियाँ हैं। उन्हें कोई नहीं मार सकता। इसका एक ही उपाय है। सीता का अपहरण। इससे उनके प्राण स्वयं ही निकल जाएँगे।”
प्रश्न :- अकंपन की बात सुनकर रावण ने क्या किया?
उत्तर :- रावण सीता-हरण के लिए तैयार हो गया।
प्रश्न :- रावण को सीता हरण से बचने के लिए किसने समझाया?
उत्तर :- तड़का के पुत्र मारीच ने।
प्रश्न :- रावण ने मारीच की बात सुनकर क्या किया?
उत्तर :- रावण ने मारीच की बात मान ली। चुपचाप लंका लौट गया।
प्रश्न :- शूर्पणखा ने रावण को क्या कहा?
उत्तर :- वह रावण को धिक्कार रही थी। फटकार रही थी। उसके पौरुष को ललकारते हुए शूर्पणखा ने कहा, “तेरे महाबली होने का क्या लाभ? तेरे रहते मेरी यह दुर्गति? तेरा बल किस दिन के लिए है? तू किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रह गया है।” शूर्पणखा ने राम-लक्ष्मण के बल की प्रशंसा की। सीता को अतीव सुंदरी बताया। कहा कि उसे लंका के राजमहल में होना चाहिए। शूर्पणखा बोली, “मैं सीता को तुम्हारे लिए लाना चाहती थी। मैंने उन्हें बताया कि मैं रावण की बहन हूँ। क्रोध में लक्ष्मण ने मेरे नाक-कान काट लिए।”
प्रश्न :- शूर्पणखा की बात सुनकर रावण ने क्या किया?
उत्तर :- मारीच को मदद करने की आज्ञा दी।
प्रश्न :- मारीच ने रावण की मदद कैसे की?
उत्तर :- रथ पर बैठकर रावण और मारीच पंचवटी पहुँचे। मारीच ने सोने के हिरण का रूप धारण कर लिया।
प्रश्न :- रावण ने किसका वेश धारण किया था?
उत्तर :- उसने तपस्वी का वेश धारण कर लिया था।
प्रश्न :- रावण कहाँ छिप गया था?
उत्तर :- रावण एक पेड़ के पीछे छिपा था।
प्रश्न :- कौन हिरण पर मुग्ध हो गया था?
उत्तर :- सीता उस हिरण पर मुग्ध हो गईं।
प्रश्न :- सीता ने हिरण को देखकर राम से क्या कहा?
उत्तर :- उन्होंने राम से उसे पकड़ने को कहा।
प्रश्न :- राम को किस पर संदेह हुआ?
उत्तर :- राम को हिरण पर संदेह था।
प्रश्न :- राम हिरण के पीछे क्यों चले गए?
उत्तर :- सीता की प्रसन्नता के लिए राम हिरण के पीछे चले गए। उन्होंने सोचा, “वन में इतने समय के प्रवास के दौरान सीता ने कभी कुछ नहीं माँगा। उनकी यह इच्छा अवश्य पूरी करनी चाहिए।”
प्रश्न :- कुटी से निकलते हुए राम ने किसे बुलाया?
उत्तर :- कुटी से निकलते समय राम ने लक्ष्मण को बुलाया। सीता की रक्षा करने का आदेश दिया। कहा, “मेरे लौटने तक तुम उन्हें अकेला मत छोड़ना।”
प्रश्न :- राम की आज्ञा पाकर लक्ष्मण ने क्या किया?
उत्तर :- लक्ष्मण ने सिर झुकाकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। सीता कुटी में थीं। लक्ष्मण धनुष लेकर बाहर खड़े हो गए।
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