कक्षा 12 » यह दीप अकेला, मैंने देखा एक बूँद (अज्ञेय)

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"यह दीप अकेला"
(कविता की व्याख्या)

यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
यह जन है-गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा?
पनडुब्बा-ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लाएगा?
यह समिधा-ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा।
यह अद्वितीय-यह मेरा-यह मैं स्वयं विसर्जित-
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ :-

मदमाता – गर्व से भरा हुआ। कृती – भाग्यवान, कुशल। पनडुब्बा – गोताखोर, एक जलपक्षी जो पानी में डूब-डूबकर मछलियाँ पकड़ता है। समिधा – यज्ञ की सामग्री। बिरला – बहुतों में एक। विसर्जित – त्यागा हुआ। अद्वितीय – जिसके जैसा कोई ओर न हो।

संदर्भ :-

व्याख्येय पद्यांश पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग दो में संकलित कविता ‘यह दीप अकेला’ से उद्धृत हैं। इस कविता के रचयिता प्रयोगवादी विचारधारा के प्रमुख कवि ‘अज्ञेय’ हैं।

प्रसंग :-

प्रस्तुत पद्यांश में कवि अज्ञेय ने दीप को सर्जनशील व्यक्ति तथा पंक्ति को समाज के प्रतीक के रूप में दिखाया है।

व्याख्या :-

अज्ञेय कहते हैं कि यह दीप रूपी व्यक्ति तेल अर्थात् ऊर्जा से भरा हुआ है, परंतु अकेला है और इसके भीतर अपनी ऊर्जा का अभिमान भी है। जब तक ये गर्वित है तब तक यह अकेला है। इसलिए इसके महत्व को बढ़ाने के लिए इसे भी पंक्ति अर्थात् समाज में शामिल कर लो। जिससे इसके गुण भी समाज के काम आ सकें और इस व्यक्ति का जीवन भी सार्थक हो सके। यह ऐसा व्यक्ति है जो अनोखे गीत गाता है या रचता है, इन गीतों को इसके अलावा और कोई नहीं गा सकता। यह व्यक्ति ऐसा गोताखोर है जो सच्चे विचारों के मोती चुनकर लाता है जिन्हें और कोई कुशल व्यक्ति खोज कर नहीं ला सकता। यह प्रतीभाशाली व्यक्ति यज्ञ की उस पवित्र सामग्री है जो स्वयं जलकर स्थान को पवित्र कर देती है। ऐसी क्रांति लाने वाला व्यक्ति है जो धुन का पक्का है और बिरला है। यह व्यक्ति अद्वितीय है, इसके समान कोई दूसरा नहीं है। यह दीपक रूपी प्रतीभाशाली व्यक्ति मुझसे जुड़ा है। यह मेरा अपना है क्याेंकि यह मेरी ही तरह सक्रिय रहता है। कवि अज्ञेय कहते हैं कि इस दीपक के माध्यम से मैं स्वयं को भी समाज पर समर्पित करता हँू। यह दीप रूपी व्यक्ति तेल अर्थात् ऊर्जा से भरा हुआ है, परंतु अकेला है और इसके भीतर अपनी ऊर्जा का अभिमान भी है। जब तक ये गर्वित है तब तक यह अकेला है। इसलिए इसके महत्व को बढ़ाने के लिए इसे भी पंक्ति अर्थात् समाज में शामिल कर लो।

विशेष :-

  • ‘दीप’ व्यक्तिगत सत्ता का प्रतीक है।
  • ‘पंक्ति’ समाज का प्रतीक है।
  • लक्षणा शब्द शक्ति का प्रयोग है।
  • ‘गाता-गीत’ ‘दे दो’ ‘कौन कृति’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग है।
  • तत्सम शब्दों की बहुलता है।
  • मुक्त छंद का प्रयोग है।
  • भाषा में प्रवाह है।

यह मधु है-स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस-जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर-फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय,
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो।
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ :-

मधु – शहद। काल – समय। मौना – मधुमक्खी। संचय – इकट्ठा करना। गोरस – दही या माखन। पूत – पवित्र। पय – दूध। निर्भय – निडर, भय रहित। प्रकृत – प्रकृति से उत्पन्न, स्वाभाविक, असली, सच्चा। स्वयंभू – ब्रह्मा, स्वयं पैदा हुआ। अयुतः – दस हजार की संख्या, असंबद्ध, पृथक, अकेला।

संदर्भ :-

व्याख्येय पद्यांश पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग दो में संकलित कविता ‘यह दीप अकेला’ से उद्धृत हैं। इस कविता के रचयिता प्रयोगवादी विचारधारा के प्रमुख कवि ‘अज्ञेय’ हैं।

प्रसंग :-

प्रस्तुत पद्यांश में कवि अज्ञेय ने दीप को सर्जनशील व्यक्ति की प्रतीभा को अलग-अलग उपमानों के माध्यम से व्यक्त करते हैं।

व्याख्या :-

कवि अज्ञेय कहते हैं कि यह दीपक रूपी व्यक्ति मधु है जिसका संचय काल रूपी मधुमक्खियाें ने लंबे समय से किया है। जिस प्रकार शहद बनने में समय लगता है उसी तरह रचनात्मकता भी धीरे-धीरे समय अनुसार निखरती है। यह गोरस है। यह प्रतीभाशाली व्यक्ति जीवन रूपी कामधेनु का अमृत रूपी दूध के समान है। जिस प्रकार अमृत का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है उसी प्रकार इस प्रतीभायुक्त व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण भी लंबे मंथन के बाद होता है। यह वह अंकुर है जो धरती की कठोर परतों को फोड़कर निर्भय होकर सूरज को देखता रहता है अर्थात् यह सत्य से आँखें मिलाने का साहस रखता है। यह प्रकृत अथवा स्वाभाविक है, यह स्वयंभू ईश्वर, ब्रह्म के समान है। अर्थात् जिस तरह ईश्वर सृजन करता है उसी प्रकार प्रतीभाशाली व्यक्ति भी सृजनशील होता है। यह व्यक्ति अयुत अर्थात् अकेला है। इसे भी समाज में शामिल करके शक्ति दे दो। यह दीप अकेला है। यह स्नेह से भरा है। यह गर्व से भरकर मदमस्त है, परंतु समाज को इसे अपने में शामिल करना चाहिए।

विशेष :-

  • ‘दीप’ व्यक्तिगत सत्ता का प्रतीक है।
  • ‘पंक्ति’ समाज का प्रतीक है।
  • लक्षणा शब्द शक्ति का प्रयोग है।
  • ‘जीवन-कामधेनु’ ‘अमृत-पूत’ में रूपक अलंकार है।
  • खड़ी बोली का प्रयोग है।
  • तत्सम शब्दों की बहुलता है।
  • भाषा में प्रवाह हैै।

यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा_
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़ुवे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा।
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो-
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

शब्दार्थ:-

लघुता – सीमित शक्ति। कुत्सा – निंदा, घृणा। द्रवित – दयालु। अनुरक्त-नेत्र – प्रेम से भरी आँखें। उल्लंब-बाहु – उठी हुई बाँह वाला। चिर-अखंड – पूर्ण। प्रबुद्ध – बुद्धिमान। श्रद्धामय – श्रद्धा से युक्त।

संदर्भ :-

व्याख्येय पद्यांश पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग दो में संकलित कविता ‘यह दीप अकेला’ से उद्धृत हैं। इस कविता के रचयिता प्रयोगवादी विचारधारा के प्रमुख कवि ‘अज्ञेय’ हैं।

प्रसंग :-

प्रस्तुत पद्यांश में कवि अज्ञेय ने दीप के माध्यम संदेश दिया है कि सृजनशील व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य बनाए रखता है। उसकी मौलिकता बनी रहती है। वह दूसरों के सम्मुख घुटने नहीं टेकता।

व्याख्या :-

कवि अज्ञेय कहते हैं कि संघर्षशील मनुष्य के अंदर परिश्रम करते रहने की क्षमता तथा शक्ति है। उसे अपनी शक्ति पर विश्वास है। वह अपनी कमियों अर्थात् सीमित साधन क्षमता पर भी कभी नहीं घबराता। वह ऐसी पीड़ा से युक्त है जो रचनात्मक असंतोष के कारण उत्पन्न हुई है। यह व्यक्ति स्वयं ही उसकी गहराई को नापत सकता है अर्थात् दुखों को व्यक्ति स्वयं सहन करता है। इस पीड़ा को कोई आम व्यक्ति समझ नहीं सकता। यह पीड़ा ही उस संघर्षरत् व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। कवि बताता है कि निंदा, अपमान, अवज्ञा के घिरते, कड़वे अंधकार में वह भी वह व्यक्ति सदा सहृद् रहता है, जागरूक रहता है और उसकी आँखें प्रेम से भरी रहती है।ं वह व्यक्ति सदैव अपनी बाँहों को उठाकर समस्त विश्व को अपनाने के लिए तैयार रहता है। ऊँचे आदर्श अपने हृदय में संजोए रखता है। वह हमेशा पूर्ण रहता है। वह मनुष्य जिज्ञासु है, बुद्धिमान और सशक्त है। वह सदा श्रद्धायुक्त रहता है। इसे भी भक्ति देनी चाहिए। यह दीपक रूपी व्यक्ति अकेला है तथा स्नेह रूपी तेल से भरा है। यह गर्व से मदमाता रहता है। इसे भी पंक्ति को दे देना चाहिए।

विशेष :-

  • मानव के गुणोें को बताया गया है।
  • तत्सम शब्दावली की प्रधानता है।
  • खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग है।
  • मुक्त छंद है।
  • ‘अपमान, अवज्ञा’ में अनुप्रास अलंकार है।
  • ‘अपनापा’ आदि नए शब्दों का प्रयोग है।
  • भाषा में लयात्मकता है।
  • नए बिंब हैं, जैसे – ‘अवज्ञा के धुँधुओ कडुवे तम’

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"मैंने देखा एक बूँद"
(कविता की व्याख्या)

मैं ने देखा
एक बूँद सहसा
उछली सागर के झाग से रंग गई क्षणभर
ढलते सूरज की आग से।
मुझ को दीख गयाः
सूने विराट् के सम्मुख
हर आलोक-छुआ अपनापन
है उन्मोचन
नश्वरता के दाग से!

शब्दार्थ :-

सहसा – अचानक। विराट – विशाल, परमात्मा, ब्रह्म। सम्मुख – सामने। आलोक – उजाला, रोशनी, ज्ञान। उन्मोचन – मुक्त करना, ढीला करना। नश्वरता – नाशशीलता, मिटना।

संदर्भ :-

व्याख्येय पद्यांश पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग – 2 में संकलित कविता ‘मैं ने देखा, एक बूँद’ से उद्धृत हैं। इस कविता के रचयिता प्रयोगवादी विचारधारा के प्रमुख कवि ‘अज्ञेय’ हैं।

प्रसंग :-

इस कविता में अज्ञेय ने जीवन में क्षण के महत्व को दर्शाया है और जीवन की क्षणभंगुरता को प्रतिष्ठापित किया है।

व्याख्या :-

कवि अज्ञेय कहते है कि सूरज के ढलते समय सागर के झाग से एक बँूद अचानक उछलती है। सूरज की आग से वह पलभर के लिए रंग गई। क्षणभर का यह दृश्य देखकर कवि को एक दार्शनिक तत्व दिखाई देता है। कवि को लगता है कि एक पल में उस बूँद का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। उसे देखकर कवि सोचने लगा कि इस विशाल संसार के सामने हर क्षण प्रकाशमान है। प्रत्येक पल का महत्व है। हर क्षण अपनेपन से भरा है। वह क्षण भर के लिए नश्वरता के दाग से मुक्त हो जाता है।

विशेष :-

  • कवि ने सागर से अलग होती बूँद की क्षणभंगुरता को दर्शाया है। कविता में दार्शनिकता है।
  • नए उपमानों का प्रयोग है-‘ढलते सूरज की आग।’
  • दृश्य बिंब का प्रयोग है।
  • खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग है।
  • तत्सम शब्दों की बहुलता है।
  • भाषा में प्रवाह है।
  • मुक्त छंद है।

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"यह दीप अकेला"
(प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न :- ‘दीप अकेला’ के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि उसे कवि ने स्नेह भरा, गर्व भरा एवं मदमाता क्यों कहा है?

उत्तर :- कवि अज्ञेय ने कहा है कि ‘दीप अकेला’ नितांत व्यक्तिगत सत्ता का प्रतीक है। प्रत्येक व्यक्ति इस जगत में एकाकी है। वह तेल से भरा है अर्थात् उसमें कोमलता भी हैै। यह दीप रूपी व्यक्ति तेल अर्थात् ऊर्जा से भरा हुआ है, परंतु अकेला है और इसके भीतर अपनी ऊर्जा का अभिमान भी है। उसमें अपने प्रति गर्व है जिससे वह मदमाता है। व्यक्ति अपने तथाकथित गुणों के कारण समाज में अपनी भिन्न सत्ता बनाए रखता है। वह नए कार्य करता है और अभिमान के कारण समाज से अलग हो जाता है।

प्रश्न :- यह दीप अकेला है ‘पर इसको भी पंक्ति को दे दो’ के आधार पर व्यष्टि का समष्टि में विलय क्यों और कैसे संभव है?

उत्तर :- कवि अज्ञेय कहते हैं कि मनुष्य में स्वाभाविक व्यक्तिगत गुण होते हैं जिसके कारण वह अकेला है। वह व्यक्ति समाज में शामिल हो जाएगा तो समाज के साथ उसके जुड़ने से समाज व राष्ट्र मजबूत होगा। इससे उसकी सत्ता का सार्वभौमीकरण होता है। यह सामान्य तौर से संभव है क्योंकि व्यापक रूप से देखें तो व्यक्ति समाज का ही अंश है। सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज और व्यक्ति सभी परस्पर मिले हुए हैं। अज्ञेय कहते हैं कि यह दीप रूपी व्यक्ति तेल अर्थात् ऊर्जा से भरा हुआ है, परंतु अकेला है और इसके भीतर अपनी ऊर्जा का अभिमान भी है। जब तक ये गर्वित है तब तक यह अकेला है। इसलिए इसके महत्व को बढ़ाने के लिए इसे भी पंक्ति अर्थात् समाज में शामिल कर लो। जिससे इसके गुण भी समाज के काम आ सकें और इस व्यक्ति का जीवन भी सार्थक हो सके।

प्रश्न :- ‘गीत’ और ‘मोती’ की सार्थकता किससे जुड़ी है?

उत्तर :- गीत की सार्थकता – ‘गीत’ मानव की भावनाओं का परिचायक है, किंतु गीत तभी सार्थक है जब वह समाज की भावनाओं को भी अभिव्यक्त करे। समाज ही व्यक्ति के गीत को महत्ता प्रदान करता है।
मोती की सार्थकता – इसी प्र्र्र्र्र्र्र्र्रकार ‘मोती’ भी मनुष्य के व्यक्तिगत प्रयासों का प्रतिफल है। समाज ही मोती को महत्व करता है। समाज ही उसका वास्तविक मूल्य आँकता है।

प्रश्न :- ‘यह अद्वितीय-यह मेरा-यह मैं स्वयं विसर्जित’ – पंक्ति के आधार पर व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता बताइए।

उत्तर :- कवि अज्ञेय कहते हैं कि यह व्यक्ति अद्वितीय है, इसके समान कोई दूसरा नहीं है। यह दीपक रूपी प्रतीभाशाली व्यक्ति मुझसे जुड़ा है। यह मेरा अपना है क्याेंकि यह मेरी ही तरह सक्रिय रहता है। कवि अज्ञेय कहते हैं कि इस दीपक के माध्यम से मैं स्वयं को भी समाज पर समर्पित करता हँू। यह दीप रूपी व्यक्ति तेल अर्थात् ऊर्जा से भरा हुआ है, परंतु अकेला है और इसके भीतर अपनी ऊर्जा का अभिमान भी है। जब तक ये गर्वित है तब तक यह अकेला है। इसलिए इसके महत्व को बढ़ाने के लिए इसे भी पंक्ति अर्थात् समाज में शामिल कर लो।

प्रश्न :- ‘यह मधु है—तकता निर्भय’ – पंक्तियों के आधार पर बताइए कि ‘मधु’, ‘गोरस’ और ‘अंकुर’ की क्या विशेषता है?

उत्तर :- कवि अज्ञेय कहते हैं कि यह दीपक रूपी व्यक्ति मधु है जिसका संचय काल रूपी मधुमक्खियाें ने लंबे समय से किया है। जिस प्रकार शहद बनने में समय लगता है उसी तरह रचनात्मकता भी धीरे-धीरे समय अनुसार निखरती है। यह गोरस है। यह प्रतीभाशाली व्यक्ति जीवन रूपी कामधेनु का अमृत रूपी दूध के समान है। जिस प्रकार अमृत का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है उसी प्रकार इस प्रतीभायुक्त व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण भी लंबे मंथन के बाद होता है। यह वह अंकुर है जो धरती की कठोर परतों को फोड़कर निर्भय होकर सूरज को देखता रहता है अर्थात् यह सत्य से आँखें मिलाने का साहस रखता है। अंकुर नई पीढ़ी का पर्याय है। यह पीढ़ी बाधाओं से न घबराते हुए आगे बढ़ती है तथा देश व समाज को आगे ले जाती है।

प्रश्न :- भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिएः-

(क) ‘यह प्रकृत, स्वयंभू —— शक्ति को दे दो।’

उत्तर :- यह प्रकृत अथवा स्वाभाविक है, यह स्वयंभू ईश्वर, ब्रह्म के समान है। अर्थात् जिस तरह ईश्वर सृजन करता है उसी प्रकार प्रतीभाशाली व्यक्ति भी सृजनशील होता है। यह व्यक्ति अयुत अर्थात् अकेला है। इसे भी समाज में शामिल करके शक्ति दे दो। यह दीप अकेला है। यह स्नेह से भरा है। यह गर्व से भरकर मदमस्त है, परंतु समाज को इसे अपने में शामिल करना चाहिए।

(ख) ‘यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक —– चिर-अखंड अपनाया।’

उत्तर :- कवि बताता है कि निंदा, अपमान, अवज्ञा के घिरते, कड़वे अंधकार में वह भी वह व्यक्ति सदा सहृद् रहता है, जागरूक रहता है और उसकी आँखें प्रेम से भरी रहती है।ं वह व्यक्ति सदैव अपनी बाँहों को उठाकर समस्त विश्व को अपनाने के लिए तैयार रहता है। ऊँचे आदर्श अपने हृदय में संजोए रखता है। वह हमेशा पूर्ण रहता है। वह सनातन है तथा इसमें अखंड अपनापन है। कवि ने मानव की विशेषताओं को बताया है। मानव बेहद सरल व कोमल भावों वाला हैै।

(ग) ‘जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो।’

उत्तर :- वह सृजनशील मनुष्य जिज्ञासु है, उसमें हमेशा जिज्ञासा का भाव रहता है। वह बुद्धिमान और सशक्त है। वह सदा श्रद्धायुक्त रहता है। इसे भी भक्ति देनी चाहिए। यह दीपक रूपी व्यक्ति अकेला है तथा स्नेह रूपी तेल से भरा है। यह गर्व से मदमाता रहता है। इसे भी पंक्ति को दे देना चाहिए।

प्रश्न :- ‘यह दीप अकेला’ एक प्रयोगवादी कविता है। इस कविता के आधार पर ‘लघु मानव’ के अस्तित्व और महत्व पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- अज्ञेय प्रयोगवादी कविता के आधार स्तंभ कहते जाते हैं। प्रयोगवादी कविता में लघुमानव को बहुत अधिक महत्व दिया गया है। विराट सत्ता का होना अलग बात है, किंतु मनुष्य का भी अपना अस्तित्व, अस्मिता व पहचान है। प्रतीभा से युक्त व्यक्ति के कार्यों से ही समाज व देश को दिशा मिलती है तथा उन्नति होती है। मनुष्य के द्वारा किया गया त्याग ही समाज में दूसरों के लिए प्रेरणा का कार्य करते हैं। संघर्षरत् लघु मानव के बिना सार्थक समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

प्रश्न :- कविता के लाक्षणिक प्रयोगों का चयन कीजिए और उनमें निहित सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- अज्ञेय प्रयोगवादी कवि हैं। इन्होंने ‘यह दीप अकेला’ कविता में अनेक स्थलों पर लाक्षणिक प्रयोग किये हैं जिससे कविता की भावाभिव्यक्ति क्षमता में वृद्धि हुई है। इस कविता में भी कवि ने अनेक नए प्रतीक प्रयोग किये हैं। ‘दीप’ को अकेला बताया गया है और वह गर्व से भरा है। ’पंक्ति’ समाज का प्रतीक है। ‘यह जन — स्वयं विसर्जित’ – इन पंक्तियों में अज्ञेय ने प्रतीभाशाली व्यक्तिगत सत्ता को केंद्र में रखा है। ‘अवज्ञा के धुँधुआते कडुवे तम’ भी एक नया प्रयोग है। इस तरह नए अभिव्यक्ति दे रहा है। इन प्रयोगों से कवि कम शब्दों में अधिक कह जाता है। इस प्रकार ‘यह दीप अकेला’ कविता अपने लाक्षणिक प्रयोगों के माध्यम से लघु मानव के अस्तित्व को प्रकट करती है।

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"मैंने देखा एक बूँद" 
(प्रश्न-उत्तर)

प्रश्न : ‘सागर’ और ‘बूँद’ से कवि का क्या आशय है?

उत्तर :- ‘सागर’ विराट सत्ता का प्रतीक है। ‘बूँद’ नश्वर मनुष्य का पर्याय है। मनुष्य परम् सत्ता का ही अंश है, फिर भी उसका पृथक् अस्तित्व है। व्यक्ति अपने छोटे-से जीवन में अनेक सही-गलत कर्म करता है और अंत में उसी परम् ब्रह्म में मिल जाता है।

प्रश्न :- ‘रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से’- पंक्ति के आधार पर बूँद के क्षणभर रंगने की सार्थकता बताइए।

उत्तर :- कवि ढलते सूरज की रोशनी में समुद्र से उठने वाली एक छोटी-सी बूँद को देख रहा है। सूरज की चेतना से बँूद रंगीन हो गई। क्षणभर का यह दृश्य देखकर कवि को एक दार्शनिक तत्व दिखाई देता है। कवि सोचने लगा कि इस विराट संसार के सम्मुख प्रत्येक क्षण प्रकाशमान है। अभिप्राय यह है कि मानव जन्म लेने के पश्चात् सांसारिक आकर्षण, मोह-माया में खो जाता है तथा वह सांसारिक चमक-दमक में स्वयं नष्ट करता है। वह युवावस्था को ही सब कुछ मान बैठता है और सोचता है कि यह जीवन कभी समाप्त नहीं होगा।

प्रश्न :- ‘सूने विराट के सम्मुख — दाग से!’ – पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- कवि कहता है कि सागर रूपी परमात्मा अत्यधिक विराट है। उसके सम्मुख बूँद रूपी मानव-जीवन क्षणिक है। वह नाशवान है। फिर भी मानव अलग अस्तित्व रखता है। संसार के सारे सुख साधन भोगने के पश्चात् भी वह विराट सत्ता के सामने अत्यन्त तुछ है। और अंत में विराट सत्ता में विलीन जाता है।

प्रश्न :- ‘क्षण के महत्व’ को उजागर करते हुए कविता का मूल भाव लिखिए।

उत्तर :- कवि अज्ञेय कहते हैं कि मानव-जीवन बहुत छोटा है। वह एक पल के समान है। जीवन की इस छोटी-सी अवधि में मनुष्य जीवन यापन करने हेतु बहुत-से कर्म करता है। इस कविता में कवि बूँद को समुद्र से अलग होती देखता है। कवि ढलते सूरज की रोशनी में समुद्र से उठने वाली एक छोटी-सी बूँद को देख रहा है। सूरज की चेतना से बूँद रंगीन हो गई। क्षणभर का यह दृश्य देखकर कवि को एक दार्शनिक तत्व दिखाई देता है। कवि सोचने लगा कि इस विराट संसार के सम्मुख प्रत्येक क्षण प्रकाशमान है।


टेस्ट/क्विज

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